ढाई घर का अणत बाजूबंद भाग 3
राजस्थान राजपूतों के इतिहास उनके शौर्य से, ऊँचे ऊँचे टीलों से,ऊँची ऊँची अरावली की पर्वत मालाओं से, पर्वतों की चोटियों पर बने हुए बड़े - बड़े किलों से, उन किलों में गूँजती हुई विभिन्न शौर्यपूर्ण गाथाओं से, ठकुराणियों के जौहर की चीत्कारियों से, विभिन्न प्रणय गाथाओं से, रणठाकुरों की तलवारों से आने वाली खनक से, राजस्थानी जहाज कहलाने वाले ऊँटों की लम्बी - लम्बी कतारों से, सुखी नदियों के घुमावदार पाटों के दोनों ओर के बीहड़ जँगलों से,गाडिया लोहारों, कानबेलियों ( सपेरों ) के कारण आज भी पूरे विश्व में जाना जाता है।
भारत वर्ष के इस अनोखे प्रान्त में बने रजवाड़ों के सुन्दर - सुंदर महल, उनमें की गयी राजपूताना शैली की पच्चीकारी, वास्तु कला के दर्शनीय नमूनें, जो आज भी जयपुर, आमेर, जोधपुर, चित्तौड़, उदयपुर, अजमेर, पुष्कर, नाथद्वारा, पाली, टोंक, बीकानेर , जैसलमेर, बाढ़मेर, नागौर, झुंझुनू,मारवाड़ , सवाई माधोपुर, अलवर, भरतपुर,कोटा आदि नगरों के वैभव, झुंझुनू में राणी सती के मंदिर, कैला देवी (करौली ) के भव्य मंदिर, भरतपुर के पास मेहन्दीपुर में सिद्ध बालाजी के सिद्ध मंदिर, खाटूश्याम जी में श्याम जी के भव्य मंदिर , पुष्कर में सृष्टि रचियता पूज्य ब्रह्मा जी का भव्य मंदिर , जयपुर में भव्य बिड़ला मंदिर, विश्व प्रसिद्द तारा मंडल ग्रह, जंतर मंतर आदि दर्शनीय व पवित्र स्थलों के कारण भी पर्यटन हेतु एक प्रमुख प्रान्त बना हुआ है।
आज भी हर वर्ष लाखों की सँख्या में विदेशी नागरिक पर्यटकों के रूप में जब भी भारत भ्रमण को आते हैं तो बिना राजस्थान के भ्रमण के उनका पर्यटन अधूरा रह जाता है। जब उन्हें राजस्थान जके बारें में वहाँ के पुराने बड़े - बड़े दुर्गों, राजस्थानी वैभव, राजपूतों के शौर्य, दुर्गों के अंदर राजस्थानी शैली से पच्चीकारी व कारीगरी युक्त वास्तुकला से पूर्ण महलों को दिखाया जाता है। ये सब देखकर पर्यटक उनके इतिहास को जानने में पूर्णतया रूचि दिखाते हैं. राजस्थान के प्रत्येक किले, उसके संबंध में पूर्ण गाथा, उनके शौर्य , जौहर गाथायें एवं धनाढ्यता की किवदंतियों को हर पर्यटक बड़े प्रेम से सुनना व जानना चाहता है।
दूर - दूर तक फैला हुआ रेगिस्तान, दोपहर में सूर्य किरणों से तपती हुई रेत से ऐसा लगता है जैसे यहाँ पर स्वर्णिम जल का वर्क विशाल भंडार हो तथा जैसे स्वर्ण जल की एक बाढ़ सी आ गई हो। हिरण भी इस दोपहर में तपती रेत की चमक को जल का भंडार समझ कर अपनी प्यास बुझाने हेतु दूर दूर तक दौड़ता चला जाता है। परन्तु उसे कहीं भी जल उपलब्ध नहीं होता। यहीं से "मृग तृष्णा " वाली कहावत भी प्रचलित हुई है।
इसी राजस्थान के दक्षिण पश्चिम भाग में सिंध प्रांत (अब पाकिस्तान) से सटा हुआ मारवाड़ नामक एक राज्य है। इस मारवाड़ राज्य की सन 1250 -- 1273 ईसवी में राठौड़ गोत्रीय राजपूत के वंशज माननीय राव साहब श्री राव सीहा जी ने स्थापना करके अपने साम्राज्य को आगे बढ़ाने की प्रेरणा अपने वंशजों को दी। इसी राठौड़ वंश के राव रिडमल जी ( 1427 -- 1438 ) के वंशज श्री राव जोधा जी ने (सन 1953 -- 1489 ) ने जोधपुर नामक नगर की स्थापना की। इसी कारण उस नगर का नाम भी उनके नाम पर ही जोधपुर रखा गया।
सन 1677 (सम्वत 1734) के पहले मुगल शासक औरंगजेब की सेनाओं के साथ भयंकर युद्ध होकर उक्त जोधपुर व मारवाड़ राज्य अजेय रहा तथा हारकर औरंगजेब को महाराज जसवंत सिंह जी प्रथम ( 1638 -- 1678) से मैत्रीय सन्धि करनी पड़ी। उस समय के युद्ध के समय औरंगजेब की सेनाओं द्वारा दागे गये तोपों के निशान आज भी महरानगढ़ दुर्ग की प्राचीरों पर विधमान हैं।
महाराज जसवंत सिंह जी प्रथम ने सन 1638 - 1678 ईसवी तक मारवाड़ व जोधपुर पर शासन करते हुए अपने वंशजों की कीर्ति ध्वजा को फहराते रहे हैं। श्री अमर सिंह जी राठौड़ भी इसी वंशज के थे बाद में उन्हें नागौर के शासक के रूप में मुगल शासकों ने नियुक्त कर दिया था।
इसी मारवाड़ राज्य के उत्तर पश्चिम भाग में एक बड़ा पर्वत है जो अरावली पर्वत श्रृंखला का ही एक भाग है।उसके साथ- साथ दो छोटी पहाड़िया भी हैं।बड़े पहाड़ पर महरानगढ़ नामक एक विशाल दुर्ग बना हुआ है।उक्त दुर्ग से पहले राठौड़ वंशज महाराजाओं का एक वंश मंदिर तथा उस वंश के वंशजों की समाधियाँ और छतरियाँ भी बनी हुई हैं। एक छोटी पहाड़ी पर एक छोटा सा दुर्ग बना हुआ है और एक अन्य पहाड़ी पर एक जहाज नुमा भवन बना हुआ है।
जोधपुर नगर के पश्चिम में महरानगढ़ दुर्ग के लिए नागौर रोड पर ही एक मार्ग बना हुआ है जो राठौड़ वँशजो की वंशावली छतरियों व मंदिर के पास से होते हुए महारानगढ़ दुर्ग को चला जाता है। वहीं वंशावली मंदिर के पास एक विशाल तालाब भी बना हुआ है। आगे जाकर उक्त मार्ग, उक्त पर्वत के पश्चिम के पुराने जोधपुर नगर के पास निकलता है।पूरा जोधपुर नगर महरानगढ़ दुर्ग वाले पर्वत को पश्चिम दक्षिण व पूर्व की तरह से घेरे हुए है।
महरानगढ़ दुर्ग का मुख्य द्वार उत्तर पूर्व दिशा में है। जो काफी बड़ा द्वार है।इसे सिंह द्वार भी कहते हैं।इसी मुख्य द्वार द्वारा दुर्ग में प्रवेश किया जाता है। इस दुर्ग में सात द्वार हैं।एक द्वार दक्षिण की तरफ जोधपुर नगर की तरफ खुलता है।शेष 5 द्वार दुर्ग में ही क्रमशः हैं।थोड़ी दूर जाने के पश्चात एक द्वार आता है।इस द्वार द्वारा प्रवेश करने के बाद, एक घुमावदार, सीधी व बड़ी चढ़ाई द्वारा एक अन्य विशाल द्वार तक पंहुचना होता है।इसी द्वार में प्रवेश के बाद ही वास्तव में दुर्ग आरम्भ होता है। यहीं पर महाराजा राठौड़ वंशज तथा राणियाँ रहा करती थी। थोड़ी चढ़ाई के बाद एक बहुत बड़ा प्रांगण आता है तथा एक ओर पूर्व की तरफ कुछ निवास बने हुए हैं।पश्चिम की ओर एक बाग बना हुआ है।
आगे बढ़ने पर किले की प्राचीरें आ जाती हैं। जहाँ बड़ी भारी - भारी तोपें रखी हुई हैं। इन तोपों को देखने से पता चलता है कि राठौड़ वंशज कितने शान्ति प्रिय थे।उन्होंने औरंगजेब की मुगल फौजों के दांत खट्टे कर दिये थे तथा हार नहीं मानी थी। बाद में औरंगजेब ने राठौड़ वँशजो से संधि करके मैत्री स्थापित कर ली थी।
दुर्ग के अंदर राठौड़ वँशजो के अस्त्र- शस्त्रों को देखकर उनके बल पौरुष का आभास करके आज के युवक व बलशाली पुरूष अपने को पौरुष हीन व नपुंसक समझने लगते हैं।उक्त अस्त्र इतने भारी हैं कि आज के युवक व पहलवान भी उन अस्त्रों व शस्त्रों को दोनों हाथों से उठा नहीं सकता।
दुर्ग के अंदर दक्षिण पश्चिम भाग में एक विशाल दुर्गा का मंदिर है।जहाँ पर दुर्ग में रहकर महाराज व महारानी पूजा हेतु जाया करते थे।मंदिर के पास एक अन्य विशाल गहरा खुला स्थान है, जो शायद क्रीड़ा हेतु रखा गया है अथवा संकट काल मे कोई मार्ग की व्यवस्था की गई है।
दुर्ग की प्राचीरें नगर से सटी हुई तथा काफी ऊँची हैं। इन प्राचीरों के सहारे खड़े होकर प्रातः काल सूर्योदय व सांयकाल सूर्यास्त के अविस्मरणीय दृश्य का आनंद मिलता है। जोधपुर नगर में राजस्थान हाई कोर्ट की बेंच के अतिरिक्त अन्य कई रमणीय व दर्शनीय स्थानों ने पर्यटकों के लिए इस नगर को दर्शनीय बना दिया है।
जोधपुर नगर का सिविल लाइंस, नया बाजार यहाँ की वैभवता व धनाढ्यता का परिचय देता है।पर्यटक गण इस नगर की तुलना दुबई ( संयुक्त अरब अमीरात) से करते हुए दुबई को जोधपुर की प्रति मूर्ति बताया गया है। समुद्र की जलवायु व समुद्र को छोड़कर शेष दोनों नगरों में काफी सामंजस्यता है। पर्यटकों की धारणा है कि जोधपुर को देखकर ही दुबई बसाया गया है। राजस्थान के सभी बड़े नगरों को वास्तव में एक योजना बद्ध तरीकों से बसाया गया है।
जोधपुर नगर के दक्षिण में पठार क्षेत्र में 4-5 किलोमीटर दूर एक छत्र पैलेस नामक महल बना हुआ है। जहाँ आजकल भारतीय पर्यटन उद्योग ने एक होटल चला रखा है। इस छत्र पैलेस की .पच्चीकारी कारीगरी व वास्तुकला का एक उत्कृष्ट नमूना है। इसे देखकर जोधपुर महाराजाओं के वैभव तथा उनके सौंदर्य प्रिय व कला प्रिय होने का भी अंदाज लगाया जा सकता है।
छत्र पैलेस के मध्य में एक अंडर ग्राउंड एक बड़ा स्विमिंग पूल महाराजा व महारानियों के नहाने का तालाब भी बना हुआ है। जिसे आजकल ढक दिया गया है। अब इसके ऊपर राजा -महाराजाओं के कुछ अस्त्र - शस्त्र तथा उनके खानपान के उपयोग में आने वाले बहुमुल्य पात्रों को प्रदर्शित किया गया है।
जिस प्रकार राठौड़ वंशज महाराजाओं के बहुमूल्य खानपान के पात्रों के उनके वैभव का पता चलता है। उसी प्रकार उनके प्रयोग में आने वाले अस्त्रों- शस्त्रों को देखकर उनके बल पौरुष का भी पता चलता है कि वे बलशाली थे।
एक किवदंती यह भी सुनने में मिलती है कि मुग़ल वंशज औरंगजेब के सेना नायकों ने उनके पौरुष और शक्ति का पता लगाने के लिये राठौड़ वंशज का एक युवक को धोखे से शेर के पिंजरे में धकेल दिया था।उस युवक ने एक ही वार से शेर का सिर धड़ से अलग कर दिया था।इस पर मुगल वंशज औरंगजेब के सेना नायक ने आश्चर्य और शर्म से अपनी गर्दन झुका ली थी।
इस जोधपुर नगर व मारवाड़ राज्य से जुड़े हुए इतिहास में विभिन्न आश्चर्यजनक किवदंतियां जुड़ी हुई हैं। इतिहास बताता है कि जोधपुर व बीकानेर नगरों के वंशज राठौड़ वंश के ही हैं।जोधपुर में कर्णी देवी का मन्दिर भी है जिनकी कृपा से ही बीकानेर कर्णी सिंह का भी अवतार हुआ है।
आजकल जोधपुर के महाराज गंज सि द्वितीय उत्तराधिकारी हैं जो जापान में रहते हैं। उनकी महारानी तथा युवराज शिवराज सिंह जी भी उनके साथ ही रहते हैं।यदा यदा जोधपुर पधारते रहते हैं।
महारानगढ़ दुर्ग की व्यवस्था आजकल भारत सरकार के पुरातत्व व पर्यटन विभाग के माध्यम से वहाँ के निर्देशक श्री नाहर सिंह जी कर रहे हैं।
यों तो इस राठौड़ वंश के साम्राज्य मारवाड़ व जोधपुर सम्भाग के सम्बंध में कई इतिहास हैं जिन पर फिर कभी विस्तार पूर्वक अलग- अलग कथाओं द्वारा व्याख्या की जायेगी ।परन्तु इस जोधपुर सम्भाग व नगर के महाराजा जसवंत सिंह जी ( प्रथम) उनके राज्य शासन के समकालीन रिया सेठ व उनके परिवार गण व विलाड़ा के सीरवी दीवान श्री राजसिंह जी की समकालीन कथाओं को लेकर ही उक्त उपन्यास लिखा गया है।जिसे आज भी मारवाड़ में "ढाई घर का अणत बाजूबंद" की संज्ञा दी जाती है तथा इसमें एक घर रिया सेठ का, एकघर विलाड़ा के सीरवी दीवान राजसिंह जी का है तथा आधा घर स्वंय मारवाड़ साम्राज्य व जोधपुर महाराज का माना गया है। यह स्वंय जोधपुर के राठौड़ वंशीय महाराजा जसवंत सिंह जी ( प्रथम) ने माना है तथा मुगल वंशज औरंगजेब व अंग्रेजों के शासनकाल में इस 'ढाई घर" का परिचय कराते समय रिया सेठ, विलाड़ा के सीरवी दीवान राजसिंह जी के पूरे एक एक घर तथा स्वयं जोधपुर साम्राज्य व जोधपुर राज घराने को आधा घर की संज्ञा देकर बताया गया कि रिया सेठ व विलाड़ा के दीवान के पास अथाह धन धान्य है।उनके सामने जोधपुर महाराज का घर आधा ही है।
जोधपुर महाराज जसवंत सिंह जी प्रथम ने समय समय पर इन दोनों घरों से सहायता पाकर इन दोनों परिवारों के प्रमुखों को अपने हाथों से पैरों में स्वर्ण धारण करवा कर अपने साथ बैठा कर सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया गया है।इससे पहले जोधपुर महाराजा परिवार गण के अतिरिक्त पैरों में स्वर्ण को कोई धारण नहीं कर सकता था।
मारवाड़ राज्य के अंतर्गत जोधपुर संभाग के इतिहास पर पड़ी धूल को झाड़ने पर कई किवदंतियों व कई घटनाओं पर प्रकाश पड़ा है तथा समय समय पर खोजने पर कई कहानियों को इतिहास ने प्रकाशित किया है। उन्हीं घटनाओं में भी से एक घटना "ढाई घर का अणत बाजूबंद" नामक घटना का पृष्ठ भी इतिहास ने खोला है।इस कथा की नई नई परते उभर कर सामने आई हैं जो आज पाठकों के सामने प्रस्तुत हैं।
इस "ढाई घर का अणत बाजूबंद " नामक कथानक के राठौड़ वंशज महाराज जसवंत सिंह जी प्रथम, रिया सेठ परिवार व विलाड़ा के सीरवी दीवान राजसिंह के आस पास की घटनाओं के ही विवरण है। राठौड़ वंश के दो महाराज जसवंत सिंह जी प्रथम (सन 1638 -- 1678 ई ) व महाराज जसवंत सिंह जी द्वितीय सन (1873 -1895 ई ) में हुए हैं। इससे इतिहास कारों व वहां की जनता में बड़ी भ्रान्ति रही है की उक्त घटना महाराज जसवंत सिंह जी प्रथम के समय में हुई है अथवा महाराज जसवंत सिंह जी द्वितीय के समय में ही है।जिसका विवरण महारान गढ़ दुर्ग से उपलब्ध विवरण से स्पष्ट हो गया है कि उक्त कथानक महाराज जसवंत सिंह जी प्रथम के समय का है।
इसी प्रकार जोधपुर संभाग में मारवाड़ राज्य में भी दो रिया हैं।एक रिया विलाड़ा तहसील में पीपाड़ नगर के पास है जो सेठों की रिया कहलाती है और दूसरी रिया मेड़ता तहसील में शेर सिंह जी की रिया है।प्रथम रिया यानि सेठों की रिया यधपि सदा से ही खाल से राज्य की रही है परन्तु रिया में धनाढ्य सेठों के कारण इसे सेठों की रिया भी कहते हैं।क्योंकि यहाँ के सेठ बड़े दानी, उदार, देशभक्त, धार्मिक प्रवृत्ति वाले रहे हैं तथा समय- समय पर यहां के सेठों ने महाराजा जोधपुर श्री जसवंत सिंह जी प्रथम को धन धान्य से सहायता करके राठौड़ वंश के महाराजाओं को मुगलों से लड़ने के लिए उत्साह भी प्रदान किया था।
इसी तरह विलाड़ा के दीवान खास आई माता के अधिष्ठाता पुजारी होने से दीवान कहलाते हैं।इसी तरह मेड़तिया गोत्र के ठाकुर श्री शेर सिंह जी मारवाड़ के सामन्तों में बड़े भारी वीर व दानी क्षत्रिय रहे हैं।जिससे उनके नाम पर ही"शेर सिंह जी की रिया" प्रसिद्ध है।
रियानगर में आज भी सेठों की बहुत बड़ी हवेली बनी हुई कि इसकी गलियों में ही आदमी भटक कर अपने अवसान खो बैठे।आसानी से आदमी एक ही गली को सीधे पार नहीं कर सकता है।
रियानगर जोधपुर से करीब 40-50 मील दूर उत्तर पश्चिम दिशा में बसा हुआ है।या नगर का अपना वैभव आज भी उसके खण्डहर आने जाने वाले हर पर्यटक को अपनी बुलंदी का इतिहास बताते हैं ।आज भी रिया के खण्डहर हर पर्यटक को अदना सा समझ कर अपनी खण्डहरी शान को गर्व से कायम किये हुए है।
एक बार जोधपुर महाराज को धन धान्य की जरूरत पड़ी। उन्होंने सुना था कि मारवाड़ के रिया सेठ के पास अपार धन दौलत है।अतः जोधपुर महाराज आ सांड ( ऊँटनी ) पर सवार होकर रिया नगर चले गये और अपना डेरा गाँव के बाहर " विला " नामक बावड़ी के पास लगाया। महाराज ने मालूम कर लिया था कि रिया सेठ रोजाना स्नान करने प्रातः काल इस बावड़ी पर आते हैं।निश्चित समय पर रिया सेठ स्नान करने बावड़ी पर आये। जब वापस जाने लगे तो उन्होंने देखा कि एक ओजस्वी राजपूत सरदार चिंता मग्न बावड़ी के पास बैठा है। उसे देखकर रिया सेठ ने पूछा -- आप कौन हैं सरदार ? किस कारण से आये हैं और कहाँ जायेंगे ? रिया सेठ के ऐसा पूछने पर -- महाराज जोधपुर ने अपने आने का सारा भेद रिया सेठ को बता दिया।
सेठ के आग्रह करने पर जोधपुर महाराज रिया सेठ की हवेली पर पधारे । सेठ ने महाराज का बड़ा आदर सत्कार किया। भोजनोपरांत महाराज जोधपुर ने रिया सेठ से कहा कि मुझे राज्य के निमित्त बहुत धन की आवश्यकता है। उनकी यह बात सुनकर सेठ ने महाराज से प्रार्थना की कि आप जोधपुर पधारिये।मैं जल्दी ही आपकी सेवा में धन भेजने की व्यवस्था कर रहा हूँ।महाराज जोधपुर आश्वासन पाकर जोधपुर चले गये।उनके जाने के एक सप्ताह बार ही रियानगर से जोधपुर महाराज के महल तक धन से भरे छकड़ों की एक कतार लगा दी। जोधपुर महाराज ने अतुल धन को देखकर अपार प्रसन्नता प्रकट की तथा उन्होंने रिया सेठ को सेठ की उपाधि से सम्मानित करके रिया सेठ का पूर्ण एक घर माना।
कालांतर में जब जोधपुर नरेश महाराज मान सिंह व अंग्रेजों के बीच एक संधि हुई तो अंग्रेजों के राजनीतिक एजेंट ने महाराज मान सिंह से जोधपुर सम्भाग में घरों की संख्या जाननी चाही तो महाराज मान सिंह जी ने उन्हें बताया कि पूरे मारवाड़ राज्य में सिर्फ "ढाई घर" ही है। एक रिया सेठ का पूर्ण घर, एक विलाड़ा के दीवान राज सिंह जी का पूर्ण घर तथा
आधे घर में मारवाड़ राज्य व जोधपुर राज परिवार सम्मिलित है। या प्रकार महाराज मान सिंह जी ने "ढाई घर" की पूर्णतया व्याख्या करते हुए अंग्रेजों के पोलिटिकल एजेंट को रिया सेठ, विलाड़ा के दीवान राज सिंह जी के वैभव, ऐश्वर्य, दानवीरता, धार्मिकता, देशभक्ति व जनप्रियता के विवरण देते हुए अपने राज्य के वैभव पूर्ण इन दोनों घरों की प्रशँसा भी की।
इसी प्रकार विलाड़ा के दीवान राज सिंह जी के बारें में भी प्रसिद्ध है कि एक बार सम्वत 1734 में आसोज सुदी 2 नवरात्रि के समय महाराज जसवन्त सिंह जी प्रथम को मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश पर जोधपुर से काबुल जाना पड़ा।यह समाचार पाकर विलाड़ा के दीवान राज सिंह जी ने भी उनके साथ काबुल चलने की इच्छा प्रकट की तथा जोधपुर से काबुल मव थाने तक आने- जाने का समस्त मार्ग व्यय वहन करने की भी प्रार्थना की।महाराज जसवंत सिंह जी प्रथम ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करके साथ चलने का निर्देश दे दिया। दीवान राज सिंह जी ने मारवाड़ के समस्त सीरवियों के नाम एक आदेश जारी करके उन्हें विलाड़ा बुलाकर प्रत्येक को एक एक गाड़ी अन्न देने को कहा तथा यात्रा आरंभ दी।उधर सीरवियों ने अन्न भरी गाड़ियां विलाड़ा भेजनी आरम्भ कर दी तथा दीवान राज सिंह जी ने अपने कामदार भवानी दास व्यास को निर्देश दिया कि सारी गाड़ियां काबुल भेज दी जावें।
मारवाड़ के सीरवियों की ओर से गेहूं भरी इतनी गाड़ियाँ पँहुची कि महाराज जसवंत सिंह जी उन्हें देखकर आश्चर्य चकित हो गये और उन्होंने खुश होकर दीवान साहब को अपने सीने से लगा लिया। तथा भविष्य में उन्हें अपने पास ही रख लिया। इसी तरह जब महाराज को धन की आवश्यकता पड़ी तो दीवान ने लाखों रुपये महाराज को भेंट कर दिये। इससे महाराज जसवंत सिंह जी प्रथम ने प्रसन्न होकर उन्हें "दीवान साहब"की उपाधि से संबोधित करते हुए उनके पैरों में स्वर्ण पहना कर उनका सम्मान किया।
इस सम्बंध में निम्नलिखित पद्ध भी प्रचलित है---
"इक घर रिया शाह को, दूजा में दीवान।
आधा में मरुधर बसे श्री जसवन्त मुख फरमान।।"
महाराज जसवन्त सिंह जी ने विलाड़े के दीवान राज सिंह तथा रिया नगर के सेठ की उदारता एवं अमूल्य सेवाओं से प्रभावित होकर बादशाह औरंगजेब से भी उनका परिचय कराते हुए बड़ी प्रशंसा की।जिससे औरंगजेब भी बहुत प्रभावित व प्रसन्न होकर हुआ। कालांतर में विलाड़ा के दीवानों की मातमपुर्सी भी महाराज तख्त सिंह जी तक विलाड़ा में ही होती आयी है।महाराज तख्त सिंह जी का शासन काल सन1843 से1873 तक रहा है। उनके बाद महाराज जसवन्त सिंह जी द्वितीय का शासन काल सन 1873 से 1895 तक रहा है।
मूहणोत गोत्रीय जैनधर्म के अनुयायी तेजसी जी के इकलौते पुत्र रिया सेठ होला जी के एक मात्र पुत्र सेठ ढोला जी अपनी धर्म पत्नी नांही बाई के साथ इस पूरी हवेली में अपने कर्मचारियों और कारिंदों के साथ युवावस्था में भारी धन धान्य से सम्पन्न होते हुए भी निःसन्तान होने के कारण संतान प्राप्ति की इच्छा से अकबर बादशाह की तरह आई माता के मंदिर तथा अन्य तीर्थों पर किसी चमत्कारी महात्मा का आशीष पाने हेतु समय समय पर भ्रमण करते रहे।परन्तु हर जगह उन्हें निराशा ही हाथ लगी।
सेठ ढोला जी अपने कारोबार को अपने पिता श्री होला जी के निर्देशन में आगे बढ़ाते रहे। उन्होंने अपने कारोबार को विदेशों तक फैला दिया था तथा भारतीय बंदरगाहों कच्छ काठियावाड़, कराची,मद्रास, विशाखा पटनम, कोचीन, कलकत्ता,मुम्बई, गोआ तथा केरल के बंदरगाहों के माध्यम से भारी मात्रा में वस्त्र, आभूषण अन्य वस्तुओं का निर्यात करने लगे तथा सूखे मेवे, समुद्री मोती, मूँगा आदि अन्य बहुत सी चीजें आयात भी करने लगे थे।
रिया सेठ ढोला जी जैन धर्म के अनुयायी होते हुए भी सभी धर्मों व सम्प्रदायों का सम्मान करते थे।ये सभी गुण उनमे पारिवारिक संस्कारों से आये थे।एक बार वे अपनी धर्म पत्नी नांही बाई को साथ लेकर आई माता के मंदिर में दर्शनार्थ गये तो वहाँ के पुजारी की बहुत अनुनय विनय करने पर पुजारी ने प्रसन्न होकर उन्हें बताया कि विलाड़ा के पास एक घने वन में बने हुए माँ भगवती के मंदिर में दशहरे के आसपास आराधना हेतु एक चमत्कारी साधु महात्मा आते हैं।वे ही आपकी मनोकामना पूर्ण करने में पूर्ण तया समर्थ हैं, आप उनकी शरण में जायें।
रिया सेठ ढोला जी व उनकी पत्नी नांही दोनों ही युवावस्था में थे और पूर्णतया स्वस्थ थे। सन्तान , विवाह के 10 वर्ष बीत जाने के बाद भी नही हुई थी।इस कारण दोनों सारे सुख होते हुए भी अपने जीवन को निस्सार मानकर काफी उदास थे।सन्तान प्राप्ति हेतु ढोला सेठ जी ने कई बार विद्वान पंडितों के कहने पर विभिन्न अनुष्ठान भी कराये ।परन्तु हर बार निराश ही होना पड़ा।
अब की बार वे सोच रहे थे कि दशहरे पर विलाड़ा के पास घने वन में बने माँ भगवती के मंदिर में अवश्य ही जाया जावे जिससे चमत्कारी महात्मा के दर्शन भी किये जा सके तथा उनसे सन्तान प्राप्ति हेतु आशीष भी लिया जा सके।
अब तक सेठाणी नांही बाई भी अपने पति को वंश वृद्धि के लिए एक भी सन्तान प्रदान नही कर सकने के कारण बड़ी उदास थी।जो भी उपाय, अनुष्ठान, पूजा,व्रत बताता।वही वह करती। इसमें रिया सेठ ढोला जी भी सन्तान प्रप्ति हेतु जो भी बन पड़ता।सेठाणी नांही बाई को सहयोग करते, दान-दक्षिणा भी वे हमेशा करते कि शायद किसी की दुआ, आशीष ही सन्तान प्राप्ति में सहायक हो सके।
सेठ ढोला जी व सेठाणी के इस दुख में हवेली के सभी नौकर-चाकर तथा गद्दी के सभी कमर्चारी भी सम्मिलित थे।उन्हें भी इस वंश की वृद्धि हेतु तथा हवेली के कारोबार को चलाने हेतु एक सन्तान की इच्छा रहती थी।वे भी विभिन्न प्रकार के अनेकों प्रकार के उपाय,व्रत, पूजा पाठ सेठ व सेठाणी को बताते रहते थे।
रिया सेठ के सम्पर्क में विदेशी व्यापारी गण भी रहते थे। वे भी सेठ ढोला के इस दुख को अपना समझ कर अपने- अपने देशों से गंडा ताबीज आदि बनवा कर यहां रियानगर में लाकर सप्रेम आदर सहित सेठ और सेठाणी को धारण करने को देते थे। बहुमुखी उपाय होने के बावजूद अब तक नांही बाई की गोद सूनी थी। वह सदा उदास रहकर सेठ ढोला जी से निवेदन करती रहती थी कि वे वंश वृद्धि हेतु दूसरा विवाह कर लें। परन्तु सेठ ढोला जी ने एक पत्नी व्रत धारण कर रखा था।
हर बार निराशा हाथ लगने पर सेठाणी नांही बाई रिया सेठ ढोला जी को दूसरा विवाह कर लेने के लिए मनाने की चेष्टा करती तथा वंश चलाने हेतु एक सन्तान की कामना लिए हुए सेठाणी हर बार सेठ ढोला जी मनाने व राजी हो जाने की चेष्टा में असफल हो जाने पर चुप हो जाती। रिया सेठ ढोला जी सेठाणी के इस अनुनय विनय पर समझाते कि दूसरी पत्नी पता नहीं कैसी हो ? और अगर उसको भी सन्तान नहीं हुई तो क्या मैं तीसरा विवाह करूँगा और हमारे भाग्य में सन्तान है तो अवश्य ही तुम्हारी कोख से पैदा होगी ।मैं दूसरा विवाह नहीं करूंगा तथा भविष्य में मुझे इस सम्बंध में कभी न कहना।यह कहकर ढोला सेठ सेठाणी को अपने सीने से लगा लेते।
रिया सेठ ढोला जी ने अपने कारोबार में काफी धन लगा रखा था।आयात-निर्यात के लिए भारत वर्ष के हर बंदरगाह के अतिरिक्त हर बड़े शहर में भी अपने व्यापार के कार्यालय खोल रखे थे।जिन पर भरोसे मन्द मुनीम व कारिंदे व्यापार की देख रेख करते थे।सेठ ढोला जी भी अपने प्रधान मुनीम जी के साथ हर वर्ष दो- तीन बार सभी कार्यालयों में पहुंच कर वहाँ के व्यापारियों से मिलकर वस्तुस्थिति का जायजा लेते थे।कभी किसी व्यापारी को कोई कठिनाई होती तो ढोला जी उनकी समस्याओं को स्वयं हल कर देते थे।
सेठ ढोला जी हर व्यापारी चाहे विदेशी हो या भारत का रहने वाला हो। सभी से बड़े प्रेम से निष्कपट मिलकर उसका ह्रदय जीत लेते थे। यदा कदा कोई आर्थिक कठिनाई भी होती तो सेठ ढोला जी उसे तत्काल दूर कर देते थे।इससे सभी देसी विदेशी व्यापारी गण रिया सेठ की गड्डी पर ही जाते थे। इससे सेठ ढोला जी की गद्दियों के कारोबार में हर वर्ष वृद्धि होती थी तथा अच्छा लाभ हर गद्दी कमाती थी। इससे सेठ ढोला जी हर वर्ष अपने मुनीम और कारिंदों को उपहार में काफी धन भी देते थे और उनकी हर सुख सुविधा का ध्यान भी रखते थे।
इस सबके होते हुए भी सेठ रिया ढोला जी बड़ी सी हवेली का आंगन सूना था और यह सूना आँगन उन्हें काटने को दौड़ता था। दिन भर तो वह गद्दी पर व्यस्त रहते थे परन्तु सुबह शाम जब वे हवेली में आते थे तब उन्हें यह दुख सताता था। नांही बाई का उदास चेहरा उन्हें सन्तान के बारें में सोचने पर मजबूर कर देता था। जिस आँगन में बच्चों की किलकारियों की गूंज होनी थी अब वहीं आँगन सेठ ढोला जी , नांही बाई के अलावा हवेली के कर्मचारियों को भी उदास सा लगने लगा था।तरह तरह की बातें सुनने को मिलती थी कोई कहता कि नांही बाई की कोख किसी ने कील दी है तो कोई कहता कि परमात्मा जिसको धन देता है उसे सन्तान नही देता, संतान देता है तो धन नहीं देता ।इस तरह की बात की बातें सुनकर सेठ और सेठाणी दोनो ही परेशान हो जाते।
कभी कभी नांही बाई सेठ ढोला जी से किसी बच्चे को गोद लेने के लिए कहती तो भी सेठ शांत चित्त रहकर नांही बाई के प्रस्ताव को अनसुना कर देते।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें