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ढाई घर का अणत बाजूबंद भाग 4

  जब नांही बाई इस घर में ब्याह कर आयी थीं तो उनके साथ एक सेविका जिन्दो बाई भी आयी थी। जो नांही बाई की ही हम उम्र थी या शायद 4- 5 वर्ष बड़ी रही होगी। गरीब परिवार की जिन्दो बाई को नांही बाई की माँ ने नांही की सेवा - सहायता के लिए उसे साथ भेज दिया था। जिन्दो ने भी सेठ ढोला की हवेली का सारा काम इस कदर सम्भाल लिया था कि जैसे वह पुराने समय से इस घर में रहती आयी हो। रसोई का सारा काम जिन्दो बाई ही करवाती थी। उसकी सहायता के लिए हवेली के कर्मचारी गण रहते थे । हवेली में क्या बनना है? क्या सामान बाज़ार से आना है इसके बारें में नांही बाई को कोई परवाह नहीं थी। इस सबका का जिम्मा जिन्दो बाई के ही कांधो पर था। सेठ ढोला भी उसके किसी काम मे अवरोध नही करते थे। जो जिन्दो बाई ने कह दिया वही सही है। यह मानकर हवेली के कामकाज में कोई भी दखलंदाजी नही करता था। हवेली की रसोई में सेठ, सेठाणी, कमर्चारी गण जिन्दो बाई तथा गद्दी के कारिंदों के अतिरिक्त बाहर के सभी व्यापारियों के लिए भी भोजन बनता था। इस सबकी व्यवस्था जिन्दो बाई के सिर पर ही थी। इस सब जिम्मेदारी को जिन्दो बाई भी बहुत ही अच्छे से निभाती भी थी। उसके निर...

ढाई घर का अणत बाजूबंद भाग 3

राजस्थान राजपूतों के इतिहास उनके शौर्य से, ऊँचे ऊँचे टीलों से,ऊँची ऊँची अरावली की पर्वत मालाओं से, पर्वतों की चोटियों पर बने हुए बड़े - बड़े किलों से, उन किलों में गूँजती हुई विभिन्न शौर्यपूर्ण गाथाओं से, ठकुराणियों के जौहर की चीत्कारियों से, विभिन्न प्रणय गाथाओं से, रणठाकुरों की तलवारों से आने वाली खनक से, राजस्थानी जहाज कहलाने वाले ऊँटों की लम्बी - लम्बी कतारों से, सुखी नदियों के घुमावदार पाटों के दोनों ओर के बीहड़ जँगलों से,गाडिया लोहारों, कानबेलियों ( सपेरों ) के कारण आज भी पूरे विश्व में जाना जाता है।  भारत वर्ष के इस अनोखे प्रान्त में बने रजवाड़ों के सुन्दर - सुंदर महल, उनमें की गयी राजपूताना शैली की पच्चीकारी, वास्तु कला के दर्शनीय नमूनें, जो आज भी जयपुर, आमेर, जोधपुर, चित्तौड़, उदयपुर, अजमेर, पुष्कर, नाथद्वारा, पाली, टोंक, बीकानेर , जैसलमेर, बाढ़मेर, नागौर, झुंझुनू,मारवाड़ , सवाई माधोपुर, अलवर, भरतपुर,कोटा आदि नगरों के वैभव, झुंझुनू में राणी सती के मंदिर, कैला देवी (करौली ) के भव्य मंदिर, भरतपुर के पास मेहन्दीपुर में सिद्ध बालाजी के सिद्ध मंदिर, खाटूश्याम जी में श्याम जी के भव्य म...

ढाई घर का अणत बाजूबंद भाग 2

  प्रस्तावना मारवाड़ राज्य के संस्थापक एवं मारवाड़ राज्य के राठौड़ वंशज नरेश श्री राव सीही जी ( 1250 -- 1273 ई०) की सोलहवीं पीढ़ी के राठौड़ वंशज श्री राव जोधा जी ( सन 1453 -- 1489 ई० ) ने मारवाड़ राज्य के अंतर्गत जोधपुर नगर की स्थापना अपने नाम के आधार पर "जोधपुर"  नामकरण करते हुए की थी। बाद में इन्हीं के राठौड़ वंश की राज्य पताका फहराते हुए श्री राव महाराजा जसवंत सिंह जी प्रथम ( सन1638 -- 1678) ने जोधपुर नगर व मारवाड़ राज्य का संचालन करते हुए सदा ही अग्रसर रहकर मारवाड़ राज्य की जनता में लोकप्रिय बने रहे।  श्री महाराजा जसवंत सिंह जी प्रथम के समकालीन विलाड़ा में सीरवी के दीवान श्री राजसिंह जी तथा रियानगर ( सेठों की रिया में धनाढ्य पारिवारिय, मूहणोत गोत्रीय जैन सम्प्रदाय के अनुयायी , सेठ होला जी भी हुए हैं। जिन्होंने मारवाड़ राज्य के राठौड़ नरेशों राव व महाराजाओं को समय - समय पर जब -- जब मारवाड़ व जोधपुर नगर पर कठिनाइयां या विपत्तियाँ आयीं, मुक्त ह्रदय व मुक्त हस्त से पूर्णतया धनधान्य से सहायता करते हुए राठौड़ वंशीय राव व महाराजाओं के प्रिय बने रहे हैं। रियानगर के सेठ होला जी के एकमात्र प...

ढाई घर का अणत बाजूबंद भाग १

सम्पूर्ण भारत वर्ष के पुरातन इतिहास एवं उसकी पौराणिक कथाओं के पढ़ने - समझने से हर कथानक एक गूढ़ कथासार के रूप में सामने आया है। सतयुग के पूर्व में देवासुर संग्राम, त्रेतायुग में राम - रावण युद्ध, द्वापर युग में महाभारत का महायुद्ध तथा भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन के भीरु होकर रथ के पृष्ठ भाग में बैठ जाने पर उसे जीवन सार के रूप में दिया गया उपदेश जो आज "गीता या श्रीमद्भागवत गीता" को एक दर्शन सार के रूप में तथा कलयुग में रजवाड़ों के, राजा महाराजाओं के परस्पर संघर्ष व शौर्य, मुगलों व अंग्रेज शासकों के विरुद्ध लड़ते हुए अपने प्राणों को न्यौछावर करते हुए शूरवीर राजस्थानी वीर बाँकुरो तथा राजस्थानियों राणियों के जौहर की गाथाओं ने इतिहास के पन्नों को भर दिया है। यों तो इतिहासकारों ने समय- समय पर भारतीय  शौर्य गाथाओं का वर्णन किया है। परंतु राजस्थान के कई भागों के पन्नों के इतिहास की धूल झाड़ कर उनमें छिपी हुई कई गाथाओं को प्रकाश में इतिहासकार नहीं ला पाये। राजस्थान के मारवाड़ राज्य के संस्थापकों राठौड़ वंशज महाराज जसवंत सिंह जी प्रथम के युग के समकालीन रियानगर ( सेठों की रिया)  तथा विलाड़ा क...